मूल श्लोक (स्वस्तिवाचन):
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः।
स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।
स्वस्तिनस्ताक्षर्यो अरिष्टनेमिः।
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु।
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शब्दार्थ:
1. स्वस्ति नः — हमारे लिए मंगल हो
2. इन्द्रः वृद्धश्रवाः — इन्द्र (वृद्धश्रवाः = जिसकी कीर्ति महान है)
3. पूषा विश्ववेदाः — पूषा (पालक देवता), जो सब कुछ जानता है
4. तार्क्ष्यः अरिष्टनेमिः — तार्क्ष्य (गरुड़), जिसकी गति में कोई विघ्न नहीं
5. बृहस्पतिः — बृहस्पति (बुद्धि और वाणी के देवता)
6. दधातु — प्रदान करें, स्थापित करें
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विस्तृत अनुवाद व व्याख्या:
1. स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः।
हमारे लिए मंगलकारी हों इन्द्रदेव, जिनकी कीर्ति सदा वृद्धिशील है।
— इन्द्र को देवताओं के राजा और युद्ध के देवता के रूप में जाना जाता है। उनकी प्रशंसा से आशय है कि वे हमें शक्ति, साहस और विजय प्रदान करें।
2. स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।
हमारे लिए मंगलकारी हों पूषा देवता, जो सब कुछ जानते हैं।
— पूषा मार्गदर्शक और सुरक्षा देने वाले देवता हैं। यह पंक्ति उनके संरक्षण और ज्ञान की कामना करती है।
3. स्वस्तिनस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः।
हमारे लिए मंगलकारी हों तार्क्ष्य (गरुड़ रूप), जिनकी गति अजेय है।
— गरुड़ विष्णु के वाहन हैं, और यह पंक्ति कहती है कि हमारी यात्रा जीवन में बिना किसी विघ्न के हो।
4. स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु।
बृहस्पति (गुरु) हमारे लिए मंगल और शुभ बुद्धि स्थापित करें।
— बृहस्पति ज्ञान, विवेक और वाणी के देवता हैं। उनकी कृपा से हम सत्य और धर्म का पालन कर सकें, यही प्रार्थना की जाती है।
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सारांश में:
यह मंत्र चार प्रमुख देवताओं — इन्द्र, पूषा, गरुड़ (तार्क्ष्य), और बृहस्पति — से हमारी रक्षा, ज्ञान, ऊर्जा, और सफलता की कामना करता है। यह वैदिक काल से चली आ रही मंगल-कामना की एक परंपरा है जिसे धार्मिक अनुष्ठानों में, यात्रा से पूर्व, या किसी शुभ कार्य के प्रारंभ में बोला जाता है।
https://youtu.be/CeYJodwCQKc?si=A-F_x_z1pt0rmVyD
ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः
स्वस्ति न: पूषा विश्ववेदा:
स्वस्तिनस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमि:
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु।
ॐ पयः पृथिव्यां, पयऽऔषधीषु,
पयो दिव्यन्तरिक्षे पयोधा:।
पयस्वती: प्रदिश: सन्तुमह्यं।।
ॐ विष्णोरराटमसि, विष्णो: श्नप्त्रेंस्त्थो,
विष्णो: स्युरसी विष्णो: ध्रुवोसि
वैष्णवमसि विष्णवे त्वा।।
ॐ अग्निर्देवता वातो देवता सूर्यो देवता चन्द्रमा देवता,
वसवो देवता रुद्रो देवतादित्यो देवता मरुतो देवता।
विश्वेदेवा देवता बृहस्पतिरतेन्द्रो देवता वरुणो देवता।।
ॐ द्यौ: शांतिरन्तरिक्षधुंशांति:
पृथिवी शांतिराप: शांतिरौषधय: शांति: वनस्पतयः शांति: विश्वेदेवा: शांति।
ब्रह्मशांति सर्व घुं शांति शान्तिरेव शांति सामाशान्तिरेधि।
ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति: सुशान्तिर्भवतु सर्वारिष्ट शान्तिर्भवतु ॥
श्रीरस्तु कल्याण मस्तु शुभं भूयात् ॥
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वर:
गुरुः साक्षात्परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः।
https://youtu.be/O8sdqfPYckw?si=M1V_gHQ1lk7T7QdX
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