Wednesday, 12 August 2026

कृष्ण का जन्म रात १२ बजे हुआ था ? तो इसका उतर भी सुन लो......

 🚩 ॐ 🚩

#सनातनकीमहिमा 🙏

ब्राह्मणों को कैसे पता चला कि कृष्ण का जन्म रात १२ बजे हुआ था ?

तो इसका उतर भी सुन लो......

शास्त्रों में कहीं भी १२ नहीं लिखा है। लिखा है - भाद्रपद कृष्ण अष्टमी, रोहिणी नक्षत्र, निशीथ काल, वृषभ लग्न 

निशीथ काल मतलब आधी रात, जिसे आज की भाषा में १२ बजे कहते हैं।

और रही घड़ी की बात, तो पीटर हेनलेन ने सिर्फ स्प्रिंग वाली घड़ी बनाई थी।

जब की भारत में उससे भी पहले हजारों सालो सै समय देखा जाता था 

१ दिन = ८ पहर १ पहर = ३ घंटा, १ घड़ी =२४ मिनट

#समय तो तब भी था,#बस तुम्हारी वाली #दीवारघड़ी नहीं थी।

        

                  #panchang #sanatansaty #bulandawazbebaak #ViralTruth

Monday, 27 July 2026

भगवतगीता - उद्धरेदात्मनात्मानं


उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मन: ॥ 5॥

उद्धरेत्-उत्थान; आत्मना-मन द्वारा; आत्मानम्-जीव; न-नहीं; आत्मानम्-जीव; अवसादयेत्-पतन होना; आत्मा-मन; एव–निश्चय ही; हि-वास्तव में; आत्मनः-जीव का; बन्धुः-मित्र; आत्मा-मन; एव-निश्चय ही; रिपुः-शत्रु; आत्मनः-जीव का।

अनुवाद

BG 6.5: मन की शक्ति द्वारा आत्म उत्थान करो और स्वयं का पतन न होने दो। मन ही जीवात्मा का मित्र और शत्रु दोनों हो सकता है।

भाष्य

 

हम अपने आत्म उत्थान और पतन के लिए स्वयं उत्तरदायी होते हैं। हमारे लिए भगवत्प्राप्ति के मार्ग में कोई भी बाधा उत्पन्न नहीं कर सकता। संत और गुरु हमें मार्ग दिखाते हैं, किन्तु हम अपनी इच्छा के मार्ग पर चलना चाहते हैं। हिन्दी में कहावत है- 'एक पेड़ पर दो पक्षी बैठे, एक गुरु एक चेला, अपनी करनी गुरु उतरे, अपनी करनी चेला।' इसका अर्थ यह है कि एक पेड़ पर दो पक्षी बैठे हैं-एक गुरु और चेला। गुरु का पतन उसके स्वयं के कर्मों से होगा और चेला भी अपने कर्मों से नीचे की ओर गिरेगा।

इस जन्म से पूर्व हमारे अनन्त जन्म हो चुके हैं और भगवत्प्राप्त संत भी सदा धरती पर रहे हैं। यदि किसी भी समय संसार ऐसे संतों से विहीन होता तब उस समय जीवात्माओं को भगवत्प्राप्ति नहीं हो सकती थी। अतः फिर लोग मानव जीवन के परम लक्ष्य भगवत्प्राप्ति को कैसे पा सकते थे? इसलिए भगवान यह सुनिश्चित करते हैं कि महापुरुष सदा प्रत्येक युग में विद्यमान रहकर निष्ठावान भक्तों का मार्गदर्शन करें और मानवता के प्रेरक बनें। इस प्रकार हम अनन्त पूर्व जन्मों में कई बार इस प्रकार के संतों से मिले हैं किन्तु फिर भी हमें कभी भगवत्प्राप्ति नहीं हुई। इसका तात्पर्य यह है कि उचित मार्गदर्शन का अभाव कभी नहीं था लेकिन या तो इन संतों के उपदेशों को स्वीकार करने में हमारी मूर्खता या इनका अनुपालन न करना ही मुख्य समस्या रही होगी। इसलिए हमें पहले अपनी वर्तमान आध्यात्मिक अवस्था या इसकी कमी को स्वीकार करना चाहिए। यदि हमें अपनी वर्तमान अवस्था का बोध हो जाता है केवल तभी हमारे भीतर आत्म विश्वास जागृत होता है और हम अपने प्रयत्नों से भी स्वयं का उत्थान कर सकते हैं।

जब हम आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग में प्रतिकूलताओं का सामना करते हैं तब हम यह शिकायत करते हैं कि अन्य लोग हमारे कष्ट का कारण हैं और वे हमारे शत्रु हैं। जबकि हमारा सबसे बड़ा शत्रु हमारा अपना मन है। विध्वंस का कारण यही मन है। मन हमारी परम लक्ष्य की अभिलाषा को निष्फल कर देता है।

श्रीकृष्ण कहते हैं कि एक ओर जीवात्मा के परम हितैषी के रूप में मन में हमें परम लाभ प्रदान करने की क्षमता होती है तथा दूसरी ओर उसमें हमें अधिकतम हानि पहुँचाने की क्षमता भी होती है। नियंत्रित मन अद्भुत कार्य पूर्ण कर सकता है जबकि अनियंत्रित मन अति अधम विचारों के द्वारा हमारी चेतना को विकृत कर सकता है। मन का मित्र के रूप में प्रयोग करने के लिए इसकी प्रवृति को समझना आवश्यक है। हमारा मन चार तत्त्वों द्वारा संचालित होता है-

मनः जब इसमें विचार उत्पन्न होते हैं तब हम इसको मन कहते हैं।
बुद्धिः जब यह विश्लेषण और निर्णय करता है तब हम इसे बुद्धि कहते हैं।
चित्तः जब यह किसी विषय या व्यक्ति के प्रति आसक्त हो जाता है तब हम इसे चित्त कहते हैं। 
अहंकारः जब हमें धन, प्रतिष्ठा, सुन्दरता और ज्ञान जैसी चीजों पर अहंकार हो जाता है तब हम इसे अहंकार कहते हैं।

यह चारों पृथक तत्त्व नहीं है। यह केवल मन की चार उपाधियाँ हैं। इसलिए हम इन्हें 'मन या मन-बुद्धि' या 'मन-बुद्धि-अहंकार' या 'मन-बुद्धि-चित्त-अहंकार' कह सकते हैं। इन सबका अभिप्राय एक ही है।

फ्रॉयडियन मनोविज्ञान में अहंकार शब्द का प्रयोग भिन्न अर्थ में किया गया है। सिगमंड फ्रॉयड (1856-1939)। इन्होने मन कैसे कार्य करता है, इसका पहला मनोवैज्ञानिक सिद्धान्त प्रस्तुत किया। उसके अनुसार अहंकार हमारा 'वास्तविक स्वरुप' है जो हमारी कामनाओं (इड) और बचपन में सीखे गए संस्कारों को जोड़ता  है।

विभिन्न ग्रंथ मन का निरूपण करने के लिए इन चारों अवयवों में से किसी एक का विश्लेषण करते हैं। यह सभी पद उसी तंत्र की ओर संकेत करते हैं जिसे अन्तःकरण या मन कहा जाता है। उदाहरणार्थ-

1. पंचदशी इन सभी चारों का एक साथ मन के रूप में उल्लेख करता है और यह व्यक्त करता है कि यह भौतिक बंधनों का कारण हैं।
2. भगवद्गीता में श्रीकृष्ण बार-बार मन और बुद्धि की चर्चा करते हैं और इन्हें भगवान को समर्पित करने पर बल देते हैं।
3. योग दर्शन प्रकृति के विभिन्न तत्त्वों का विश्लेषण करते समय तीन तत्त्वों मन, बुद्धि और अहंकार की चर्चा करता है।
4. शंकराचार्य ने आत्मा को स्पष्ट करते समय मन को चार प्रकार से वर्गीकृत किया है-मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार।

इसलिए जब श्रीकृष्ण कहते हैं कि हमें मन का प्रयोग स्वयं के उत्थान के लिए करना चाहिए तब उनका कहने का तात्पर्य यह होता है कि हमें अपने उन्नत मन या बुद्धि का प्रयोग कर अपने अवनत मन को ऊपर उठाना चाहिए। दूसरे शब्दों में हमें बुद्धि का प्रयोग मन को नियंत्रित करने के लिए करना चाहिए। ऐसा कैसे संभव है? इसकी विस्तृत व्याख्या श्लोक 2.41 और 2.44 और पुनः श्लोक 3.33 में की गयी है।

Tuesday, 30 June 2026

हनुमान चालीसा (अर्थ सहित)

 हनुमान चालीसा 

कहइ रीछपति सुनु हनुमाना। का चुप साधि रहेहु बलवाना॥
कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥
पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना॥

 अर्थ -

ऋक्षराज जाम्बवान ने श्री हनुमान जी से कहा- हे हनुमान्‌! हे बलवान्‌! सुनो, तुमने यह क्या चुप साध रखी है? तुम पवन के पुत्र हो और बल में पवन के समान हो। तुम बुद्धि-विवेक और विज्ञान की खान हो। जगत में कौन सा ऐसा कठिन काम है जो हे तात! तुमसे न हो सके।


दोहा   (अर्थ सहित)

श्री गुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुर सुधारि ।
\बरनउं रघुबर विमल जस, जो दायकु फल चारि ।
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवनकुमार ।
बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार ॥

मैं अपने गुरु के चरणों की धूल से अपनेमन रूपी दर्पण को शुद्ध करता हूँ ।
मैं प्रभु श्री राम के निर्मल यश का वर्णन करता हूँ, जो चार प्रकार के फल - धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को प्रदान करने वाले हैं।
हे पवनकुमार ! मैं अपने आप को शरीर और बुद्धि से कमजोर जान कर आपका स्मरण करता हूँ ।
आप मुझे शारीरिक बल, सद्बुद्धि एवं ज्ञान देकर मेरे दुःखों व दोषों का नाश कीजिए ।


चौपाई

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर । जय कपीस तिहुँ लोक उजागर ॥
रामदूत अतुलित बल धामा । अंजनिपुत्र पवनसुत नामा ॥
महाबीर बिक्रम बजरंगी | कुमति निवार सुमति के संगी ॥
कंचन बरन बिराज सुबेसा । कानन कुंडल कुंचित केसा ॥

ज्ञान व गुणों के सागर श्री हनुमान जी, आपकी जय हो । हे कपीश्वर ( वानरों के ईश्वर), आपकी जय हो! तीनों लोकों में आपकी कीर्ति है
आप अतुलनीय शक्ति के धाम और भगवान श्री राम जी के दूत हैं । आप माता अंजनी के पुत्र व पवनपुत्र के नाम से जाने जाते हैं ।
हे महावीर बजरंग बलि, आप अनन्त पराक्रमी हैं। आप दुष्ट बुद्धि को दूर करते हैं तथा सुमति (उत्तम बुद्धि) वालों के मित्र हैं।
आपकी त्वचा सुनहरे रंग की है और आप सुन्दर वस्त्रों से सुसज्जित हैं। आपके कानों में कुण्डल व आपके घुंघराले बाल आपकी शोभा को बढ़ा रहे हैं ।


हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै ।
काँधे मूँज जनेऊ साजै ॥
संकर सुवन केसरीनंदन । तेज प्रताप महा जग बंदन ॥
बिद्यावान गुनी अति चातुर । राम काज करिबे को आतुर ॥
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया । राम लखन सीता मन बसिया ॥

चौपाई

आपके हाथों में गदा और ध्वज है । आपके कंधे पर मूँज का जनेऊ शोभायमान है ।
हे भगवान शिव के अवतार, राजा केसरी के पूरा ब्रह्मांड आपके पराक्रम, आपकी महिमा और वैभव की वंदना करता है।
पुत्र ! आप विद्या के शास्त्री, गुणी तथा अत्यन्त कुशल व बुद्धिमान् हैं । आप सदैव भगवान श्री राम जी का कार्य करने के लिए तत्पर रहते हैं ।
भगवान श्री राम जी की महिमा को सुनकर आपको अत्यंत आनंद मिलता है । आपके हृदय में प्रभु श्री राम जी, श्री लक्ष्मण जी और माता सीता का निवास है।

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा । बिकट रूप धरि लंक जरावा ॥
भीम रूप धरि असुर सँहारे । रामचन्द्र के काज सँवारे ॥
लाय सजीवन लखन जियाये । श्री रघुबीर हरषि उर लाये ॥
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई । तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई ॥

आपने एक ओर माता सीता को अपना सूक्ष्म रूप दिखाया, तो वहीं दूसरी ओर अपना विकराल रूप धारण करके रावण की लंका को जलाया ।
आपने विकराल रूप धारण कर असुरों का सँहार किया, जिससे प्रभु श्री राम जी का कार्य पूर्ण हुआ ।
संजीवनी बूटी लाकर आपने श्री लक्ष्मण जी के प्राण बचाए, जिससे प्रभु श्री राम जी ने हर्षित
होकर आपको हृदय से लगा लिया ।
भगवान श्री राम जी ने आपकी बहुत प्रशंसा की और कहा, “आप मुझको भरत के समान ही प्रिय हैं”।

सहस बदन तुम्हरो जस गावैं अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावैं
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा । नारद सारद सहित अहीसा ॥
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते । कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा । राम मिलाय राज पद दीन्हा ॥

हजार सिर वाले सर्पराज आदिशेष आपकी महिमा गाते हैं !” भगवान श्री राम जी (देवी श्री लक्ष्मी जी के पति) ने आपका हृदय से लगाते हुए ऐसा कहा ।
सनक आदि ऋषि, ब्रह्मा आदि देवगण तथा मुनि नारद, माता सरस्वती और आदिशेष जी;
यहाँ तक कि यम देवता, कुबेर देवता, दिग्पालक (10 दिशाओं के देवता) भी आपकी महिमा का वर्णन नहीं कर पाए हैं । फिर कवि, कोविद (वेदों के ज्ञानी, वेदज्ञ) और विद्वान् इसका पार कहाँ पा सकते हैं।
आपने सुग्रीव पर भी बड़ा उपकार किया । आपने उन्हें प्रभु श्री राम जी से मिलवाया और इस प्रकार उनका राज्य किष्किन्धा उन्हें वापस दिलावाया ।

तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना । लंकेस्वर भए सब जग जाना ॥
जुग सहस्र जोजन पर भानू । लील्यो ताहि मधुर फल जानू
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं । | जलधि लाँघि गए अचरज नाहीं ॥

इसी प्रकार आपके उपदेशों का विभीषण ने भी पालन किया और वह लंका के राजा बने । यह सारा संसार जानता है ।
जो सूर्यदेव हजारों युग मील दूर हैं, आपने उनको एक मीठा फल समझकर निगल लिया ।
आपने भगवान श्री राम जी की अंगूठी को अपने मुख में रख कर समुद्र पार कर लिया, इसमें कोई आश्चर्य नहीं है ।
दुर्गम काज जगत के जेते । सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ॥
आपकी कृपा से इस संसार के कठिन से कठिन कार्य भी सहज हो जाते हैं ।

राम दुआरे तुम रखवारे । होत न आज्ञा बिनु पैसारे ॥
सब सुख लहै तुम्हारी सरना । तुम रक्षक काहू को डर ना ॥
आपन तेज सम्हारो आपै । तीनों लोक हाँक तें काँपै ॥
भूत पिसाच निकट नहिं आवै । महाबीर जब नाम सुनावै ॥

प्रभु श्री राम जी के द्वार के आप द्वारपाल हैं । आपकी अनुमति के बिना वहाँ किसी का भी प्रवेश निषेध है, अर्थात भगवान राम के दर्शन आपके आशीर्वाद से ही संभव हैं।
जो आपकी शरण लेते हैं, उन्हें सर्व सुख प्राप्त होते हैं। जब आप रक्षक हैं, तब डर भय का कोई अस्तित्त्व ही नहीं है।
आपके तेज को आप स्वयं ही संभाल सकते हैं। आपके गरजने से तीनों लोक काँप उठते हैं।
हे महावीर! आपका नाम स्मरण करने से ही, भूत और पिशाच निकट नहीं आते।

नासै रोग हरै सब पीरा । जपत निरंतर हनुमत बीरा ॥
संकट तें हनुमान छुडावै । मन क्रम बचन ध्यान जो लावै ॥
सब पर राम तपस्वी राजा । तिन के काज सकल तुम साजा ॥
और मनोरथ जो कोई लावै । सोई अमित जीवन फल पावै ॥

हे वीर हनुमान जी, आपके नाम का निरन्तर जप करने से, सब प्रकार के रोग, पीड़ा और कष्ट नष्ट हो जाते हैं ।
जो लोग अपने मन, क्रम और वचनों में भगवान् श्री हनुमान जी का ध्यान मनन करते हैं, वे उनके द्वारा जीवन की सभी कठिनाइयों से मुक्ति पाते हैं।
तपस्वी राजा भगवान श्री राम जी सबसे श्रेष्ठ हैं और आप उन सभी लोगों के कार्य पूर्ण करते हैं, जो प्रभु श्री राम जी की शरणागति हैं ।
जो कोई भी आपके समक्ष अपनी इच्छा लाता है, वे अन्ततः जीवन में असीमित, उच्चतम फल प्राप्त करता है ।

चारों जुग परताप तुम्हारा । है परसिद्ध जगत उजियारा ॥
साधु सन्त के तुम रखवारे । असुर निकन्दन राम दुलारे ॥
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता । अस बर दीन जानकी माता ॥
राम रसायन तुम्हरे पासा । सदा रहो रघुपति के दासा ॥


आपकी महिमा चारों युगों में विद्यमान् है । आपकी महानता बहुत प्रसिद्ध है और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में प्रकाशमान् है ।
आप साधु-सन्तों के रखवाले और असुरों का वध करने वाले हैं और प्रभु श्री राम जी के अत्यन्त प्रिय, दुलारे हैं।
आपको माता जानकी से ऐसा वरदान प्राप्त है कि आप किसी को भी आठों सिद्धियाँ और नौ निधियाँ (संपत्तियाँ) दे सकते हैं।
आपके पास श्री राम नाम का रसायन (भक्ति रस) है। आप सदैव रघुपति (प्रभु श्री राम जी) के भक्त बने रहें ।

तुम्हरे भजन राम को पावै । जनम जनम के दुख बिसरावै ||
अंत काल रघुबर पुर जाई । जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई ॥
और देवता चित्त न धरई । हनुमत सेई सर्ब सुख करई ॥
संकट कटै मिटै सब पीरा । जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ॥

आपके स्मरण मात्र से स्वयं भगवान श्री राम प्राप्त होते हैं क्योंकि जो कोई भी आपका स्मरण करता है, वह श्री राम प्रभु को अत्यन्त प्रिय होता है तथा उसको जन्म-जन्मान्तर के कष्टों से मुक्ति मिल जाती है ।
आपकी स्तुति करने वाले अपने अंत समय में रघुनाथ जी के धाम को जाते हैं और यदि फिर कहीं भी जन्म लेते हैं तो राम भक्त ही कहलाते हैं।
यहाँ तक कि किसी अन्य देवता को पूजे बिना, केवल श्री हनुमान जी को पूजने मात्र से ही सर्व सुख प्राप्त हो जाते हैं ।
हनुमान, हे वीर जो व्यक्ति आपका स्मरण करता है, उसके सभी संकट दूर हो जाते हैं और उसकी सभी पीड़ा मिट जाती है ।

जै जै जै हनुमान गोसाईं । कृपा करहु गुरुदेव की नाई ॥
जो सत बार पाठ कर कोई । छूटहि बंदि महा सुख होई ॥
जो यह पढ़े हनुमान चालीसा । होय सिद्धि साखी गौरीसा ॥
तुलसीदास सदा हरि चेरा । कीजै नाथ हृदय महँ डेरा ॥


हे मेरे स्वामी, श्री हनुमान जी ! आपकी जय हो, जय हो, जय हो! हमारे परम गुरु के रूप में अपनी कृपा से हमें कृतार्थ कीजिये, आशीर्वाद दीजिये ।
जो कोई हनुमान चालीसा का सौ बार पाठ करता है, वह सभी बंधनों से मुक्त हो जाता है और उसे परम आनंद की प्राप्ति होती है ।
जो इस हनुमान चालीसा को पढ़ता है, उसके सभी कार्य सिद्ध होते हैं। भगवान शिव स्वयं इसके साक्षी हैं ।
तुलसीदास कहते हैं, हे हनुमान जी, मैं हमेशा भगवान श्री राम का सेवक और भक्त बना रहूँ।
और आप सदा मेरे हृदय में निवास करें ।

हनुमान चालीसा  दोहा (अर्थ सहित)
पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप ।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप ॥

हे पवनपुत्र, आप सभी दुखों का नाश करने वाले हैं, आप सौभाग्य और समृद्धि के स्वरुप हैं ।
आप भगवान श्री राम जी, श्री लक्ष्मण जी और माता सीता के संग मेरे हृदय में निवास कीजिये ।

बोलिए सियावर रामचन्द्र भगवान की जय
पवनसुत हनुमान की जय
उमापति महादेव की जय