Sunday, 9 February 2025
Friday, 10 April 2020
Hanuman Chalisa
Hanuman Chalisa Hindi Lyrics
दोहा
श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि ।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि ॥
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन कुमार
बल बुधि विद्या देहु मोहि, हरहु कलेश विकार
चौपाई
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥१॥
राम दूत अतुलित बल धामा
अंजनि पुत्र पवनसुत नामा॥२॥
महाबीर बिक्रम बजरंगी
कुमति निवार सुमति के संगी॥३॥
कंचन बरन बिराज सुबेसा
कानन कुंडल कुँचित केसा॥४॥
हाथ बज्र अरु ध्वजा बिराजे
काँधे मूँज जनेऊ साजे॥५॥
शंकर सुवन केसरी नंदन
तेज प्रताप महा जगवंदन॥६॥
विद्यावान गुनी अति चातुर
राम काज करिबे को आतुर॥७॥
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया
राम लखन सीता मनबसिया॥८॥
सूक्ष्म रूप धरि सियहि दिखावा
विकट रूप धरि लंक जरावा॥९॥
भीम रूप धरि असुर सँहारे
रामचंद्र के काज सवाँरे॥१०॥
लाय सजीवन लखन जियाए
श्री रघुबीर हरषि उर लाए॥११॥
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई
तुम मम प्रिय भरत-हि सम भाई॥१२॥
सहस बदन तुम्हरो जस गावै
अस कहि श्रीपति कंठ लगावै॥१३॥
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा
नारद सारद सहित अहीसा॥१४॥
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते
कवि कोविद कहि सके कहाँ ते॥१५॥
तुम उपकार सुग्रीवहि कीन्हा
राम मिलाय राज पद दीन्हा॥१६॥
तुम्हरो मंत्र बिभीषण माना
लंकेश्वर भये सब जग जाना॥१७॥
जुग सहस्त्र जोजन पर भानू
लिल्यो ताहि मधुर फ़ल जानू॥१८॥
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माही
जलधि लाँघि गए अचरज नाही॥१९॥
दुर्गम काज जगत के जेते
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥२०॥
राम दुआरे तुम रखवारे
होत ना आज्ञा बिनु पैसारे॥२१॥
सब सुख लहैं तुम्हारी सरना
तुम रक्षक काहु को डरना॥२२॥
आपन तेज सम्हारो आपै
तीनों लोक हाँक तै कापै॥२३॥
भूत पिशाच निकट नहि आवै
महावीर जब नाम सुनावै॥२४॥
नासै रोग हरे सब पीरा
जपत निरंतर हनुमत बीरा॥२५॥
संकट तै हनुमान छुडावै
मन क्रम वचन ध्यान जो लावै॥२६॥
सब पर राम तपस्वी राजा
तिनके काज सकल तुम साजा॥२७॥
और मनोरथ जो कोई लावै
सोई अमित जीवन फल पावै॥२८॥
चारों जुग परताप तुम्हारा
है परसिद्ध जगत उजियारा॥२९॥
साधु संत के तुम रखवारे
असुर निकंदन राम दुलारे॥३०॥
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता
अस बर दीन जानकी माता॥३१॥
राम रसायन तुम्हरे पासा
सदा रहो रघुपति के दासा॥३२॥
तुम्हरे भजन राम को पावै
जनम जनम के दुख बिसरावै॥३३॥
अंतकाल रघुवरपुर जाई
जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई॥३४॥
और देवता चित्त ना धरई
हनुमत सेई सर्व सुख करई॥३५॥
संकट कटै मिटै सब पीरा
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥३६॥
जै जै जै हनुमान गुसाईँ
कृपा करहु गुरु देव की नाई॥३७॥
जो सत बार पाठ कर कोई
छूटहि बंदि महा सुख होई॥३८॥
जो यह पढ़े हनुमान चालीसा
होय सिद्ध साखी गौरीसा॥३९॥
तुलसीदास सदा हरि चेरा
कीजै नाथ हृदय मह डेरा॥४०॥
दोहा
पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥
दोहा
श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि ।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि ॥
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन कुमार
बल बुधि विद्या देहु मोहि, हरहु कलेश विकार
चौपाई
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥१॥
राम दूत अतुलित बल धामा
अंजनि पुत्र पवनसुत नामा॥२॥
महाबीर बिक्रम बजरंगी
कुमति निवार सुमति के संगी॥३॥
कंचन बरन बिराज सुबेसा
कानन कुंडल कुँचित केसा॥४॥
हाथ बज्र अरु ध्वजा बिराजे
काँधे मूँज जनेऊ साजे॥५॥
शंकर सुवन केसरी नंदन
तेज प्रताप महा जगवंदन॥६॥
विद्यावान गुनी अति चातुर
राम काज करिबे को आतुर॥७॥
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया
राम लखन सीता मनबसिया॥८॥
सूक्ष्म रूप धरि सियहि दिखावा
विकट रूप धरि लंक जरावा॥९॥
भीम रूप धरि असुर सँहारे
रामचंद्र के काज सवाँरे॥१०॥
लाय सजीवन लखन जियाए
श्री रघुबीर हरषि उर लाए॥११॥
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई
तुम मम प्रिय भरत-हि सम भाई॥१२॥
सहस बदन तुम्हरो जस गावै
अस कहि श्रीपति कंठ लगावै॥१३॥
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा
नारद सारद सहित अहीसा॥१४॥
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते
कवि कोविद कहि सके कहाँ ते॥१५॥
तुम उपकार सुग्रीवहि कीन्हा
राम मिलाय राज पद दीन्हा॥१६॥
तुम्हरो मंत्र बिभीषण माना
लंकेश्वर भये सब जग जाना॥१७॥
जुग सहस्त्र जोजन पर भानू
लिल्यो ताहि मधुर फ़ल जानू॥१८॥
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माही
जलधि लाँघि गए अचरज नाही॥१९॥
दुर्गम काज जगत के जेते
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥२०॥
राम दुआरे तुम रखवारे
होत ना आज्ञा बिनु पैसारे॥२१॥
सब सुख लहैं तुम्हारी सरना
तुम रक्षक काहु को डरना॥२२॥
आपन तेज सम्हारो आपै
तीनों लोक हाँक तै कापै॥२३॥
भूत पिशाच निकट नहि आवै
महावीर जब नाम सुनावै॥२४॥
नासै रोग हरे सब पीरा
जपत निरंतर हनुमत बीरा॥२५॥
संकट तै हनुमान छुडावै
मन क्रम वचन ध्यान जो लावै॥२६॥
सब पर राम तपस्वी राजा
तिनके काज सकल तुम साजा॥२७॥
और मनोरथ जो कोई लावै
सोई अमित जीवन फल पावै॥२८॥
चारों जुग परताप तुम्हारा
है परसिद्ध जगत उजियारा॥२९॥
साधु संत के तुम रखवारे
असुर निकंदन राम दुलारे॥३०॥
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता
अस बर दीन जानकी माता॥३१॥
राम रसायन तुम्हरे पासा
सदा रहो रघुपति के दासा॥३२॥
तुम्हरे भजन राम को पावै
जनम जनम के दुख बिसरावै॥३३॥
अंतकाल रघुवरपुर जाई
जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई॥३४॥
और देवता चित्त ना धरई
हनुमत सेई सर्व सुख करई॥३५॥
संकट कटै मिटै सब पीरा
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥३६॥
जै जै जै हनुमान गुसाईँ
कृपा करहु गुरु देव की नाई॥३७॥
जो सत बार पाठ कर कोई
छूटहि बंदि महा सुख होई॥३८॥
जो यह पढ़े हनुमान चालीसा
होय सिद्ध साखी गौरीसा॥३९॥
तुलसीदास सदा हरि चेरा
कीजै नाथ हृदय मह डेरा॥४०॥
दोहा
पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥
Saturday, 28 March 2020
वीर मराठा योद्धा बाजीराव
अटक से कटक तक जिसने हिंदवी राज का भगवा फहराया था,
वह वीर मराठा योद्धा ही बाजीराव कहलाया था।
उन्होंने १२ नवंबर, १७३६ को पुणे से दिल्ली मार्च शुरू कि। मुगल बादशाह ने आगरा के गवर्नर सादात खां को उनसे निपटने का जिम्मा सौंपा। मल्हारराव होलकर और पिलाजी जाधव की सेनाएं यमुना पार कर के दोआब में आ गईं। मराठों से खौफ में था सादात खां, उसने डेढ़ लाख की सेना जुटा ली। मराठों के पास तो कभी भी एक मोर्चे पर इतनी सेना नहीं रही थी। लेकिन उनकी रणनीति के चलते मल्हारराव होलकर ने रणनीति अनुसार मैदान छोड़ दिया। सादात खां ने इसे मराठों का डरना समझा और उसने डींगें मारते हुए अपनी जीत का सारा विवरण मुगल बादशाह को पहुंचा दिया और खुद सेना लेकर मथुरा की तरफ चला गया।
बस उसी वक्त बाजीराव ने सादात खां और मुगल दरबार को सबक सिखाने की सोची। मुगलों का और खासकर दिल्ली दरबार का खौफ सबके सिर चढ़कर बोलता था। लेकिन बाजीराव को पता था कि ये खौफ तभी हटेगा जब दिल्ली पर हमला होगा। सारी मुगल सेना आगरा-मथुरा में अटक गई और बाजीराव दिल्ली तक चढ़ आया, आज जहां तालकटोरा स्टेडियम है, वहां बाजीराव ने डेरा डाल दिया।
१० दिन की दूरी बाजीराव ने केवल ५०० घोड़ों के साथ ४८ घंटे में पूरी की; बिना रुके, बिना थके। बाजीराव ने तालकटोरा में अपनी सेना का कैंप डाल दिया, ५०० घोड़े थे उसके पास। मुगल बादशाह मोहम्मद शाह रंगीला बाजीराव को लाल किले के इतना करीब देखकर घबरा गया। उसने खुद को लाल किले के अंदर सुरक्षित इलाके में कैद कर लिया और मीर हसन कोका की अगुआई में 8 से 10 हजार सैनिकों की टोली बाजीराव से निपटने के लिए भेजी। बाजीराव के ५०० लड़ाकों ने उस सेना को बुरी तरह शिकस्त दी।
कितना आसान था बाजीराव के लिए लाल किले में घुसकर दिल्ली पर कब्जा कर लेना। एक बार तो मुगल बादशाह ने योजना बना ली थी कि लाल किले के गुप्त रास्ते से भागकर अवध चला जाए लेकिन बाजीराव बस मुगलों को अपनी ताकत का अहसास दिलाना चाहता था। वो ३ दिन तक वहीं डेरा डाले रहा, पूरी दिल्ली एक तरह से मराठों के रहमोकरम पर थी। उसके बाद बाजीराव वापस लौट गए।
निजाम दिल्ली आया और उसने कई मुगल सिपहसालारों ने हाथ मिलाते हुए बाजीराव को धूल चटाने का संकल्प लेकर कूच कर दिया। लेकिन बाजीराव बल्लाल भट्ट दूरदर्शी योद्धा थे। वह पहले से ही यह सब जानता थे। वह अपने भाई के साथ १०,००० सैनिकों को दक्कन की सुरक्षा का भार देकर ८०,००० सैनिकों के साथ फिर दिल्ली की तरफ निकल पड़े। इस बार मुगलों को निर्णायक युद्ध में हराने का इरादा था ताकि वे फिर सिर न उठा सकें।
दिल्ली से निजाम की नेतृत्व में मुगलों की विशाल सेना और दक्कन से बाजीराव की नेतृत्व में मराठा सेना निकल पड़ी। दोनों सेनाएं भोपाल में मिलीं। निजाम ने अपनी जान बचाने के के लिए बाजीराव से संधि कर ली। इस बार ०७ जनवरी, १७३८ को ये संधि दोराहा में हुई। मालवा, मराठों को सौंप दिया गया और मुगलों ने ५० लाख रुपए बतौर हर्जाना बाजीराव को सौंपे।
चूंकि निजाम हर बार संधि तोड़ता था तो बाजीराव ने इस बार निजाम को मजबूर किया कि वो कुरान की कसम खाकर संधि की शर्तें दोहराए। ये मुगलों की अब तक की सबसे बड़ी हार थी और मराठों की सबसे बड़ी जीत।
लेखिका : शिवानी शाह
वह वीर मराठा योद्धा ही बाजीराव कहलाया था।
उन्होंने १२ नवंबर, १७३६ को पुणे से दिल्ली मार्च शुरू कि। मुगल बादशाह ने आगरा के गवर्नर सादात खां को उनसे निपटने का जिम्मा सौंपा। मल्हारराव होलकर और पिलाजी जाधव की सेनाएं यमुना पार कर के दोआब में आ गईं। मराठों से खौफ में था सादात खां, उसने डेढ़ लाख की सेना जुटा ली। मराठों के पास तो कभी भी एक मोर्चे पर इतनी सेना नहीं रही थी। लेकिन उनकी रणनीति के चलते मल्हारराव होलकर ने रणनीति अनुसार मैदान छोड़ दिया। सादात खां ने इसे मराठों का डरना समझा और उसने डींगें मारते हुए अपनी जीत का सारा विवरण मुगल बादशाह को पहुंचा दिया और खुद सेना लेकर मथुरा की तरफ चला गया।
बस उसी वक्त बाजीराव ने सादात खां और मुगल दरबार को सबक सिखाने की सोची। मुगलों का और खासकर दिल्ली दरबार का खौफ सबके सिर चढ़कर बोलता था। लेकिन बाजीराव को पता था कि ये खौफ तभी हटेगा जब दिल्ली पर हमला होगा। सारी मुगल सेना आगरा-मथुरा में अटक गई और बाजीराव दिल्ली तक चढ़ आया, आज जहां तालकटोरा स्टेडियम है, वहां बाजीराव ने डेरा डाल दिया।
१० दिन की दूरी बाजीराव ने केवल ५०० घोड़ों के साथ ४८ घंटे में पूरी की; बिना रुके, बिना थके। बाजीराव ने तालकटोरा में अपनी सेना का कैंप डाल दिया, ५०० घोड़े थे उसके पास। मुगल बादशाह मोहम्मद शाह रंगीला बाजीराव को लाल किले के इतना करीब देखकर घबरा गया। उसने खुद को लाल किले के अंदर सुरक्षित इलाके में कैद कर लिया और मीर हसन कोका की अगुआई में 8 से 10 हजार सैनिकों की टोली बाजीराव से निपटने के लिए भेजी। बाजीराव के ५०० लड़ाकों ने उस सेना को बुरी तरह शिकस्त दी।
कितना आसान था बाजीराव के लिए लाल किले में घुसकर दिल्ली पर कब्जा कर लेना। एक बार तो मुगल बादशाह ने योजना बना ली थी कि लाल किले के गुप्त रास्ते से भागकर अवध चला जाए लेकिन बाजीराव बस मुगलों को अपनी ताकत का अहसास दिलाना चाहता था। वो ३ दिन तक वहीं डेरा डाले रहा, पूरी दिल्ली एक तरह से मराठों के रहमोकरम पर थी। उसके बाद बाजीराव वापस लौट गए।
निजाम दिल्ली आया और उसने कई मुगल सिपहसालारों ने हाथ मिलाते हुए बाजीराव को धूल चटाने का संकल्प लेकर कूच कर दिया। लेकिन बाजीराव बल्लाल भट्ट दूरदर्शी योद्धा थे। वह पहले से ही यह सब जानता थे। वह अपने भाई के साथ १०,००० सैनिकों को दक्कन की सुरक्षा का भार देकर ८०,००० सैनिकों के साथ फिर दिल्ली की तरफ निकल पड़े। इस बार मुगलों को निर्णायक युद्ध में हराने का इरादा था ताकि वे फिर सिर न उठा सकें।
दिल्ली से निजाम की नेतृत्व में मुगलों की विशाल सेना और दक्कन से बाजीराव की नेतृत्व में मराठा सेना निकल पड़ी। दोनों सेनाएं भोपाल में मिलीं। निजाम ने अपनी जान बचाने के के लिए बाजीराव से संधि कर ली। इस बार ०७ जनवरी, १७३८ को ये संधि दोराहा में हुई। मालवा, मराठों को सौंप दिया गया और मुगलों ने ५० लाख रुपए बतौर हर्जाना बाजीराव को सौंपे।
चूंकि निजाम हर बार संधि तोड़ता था तो बाजीराव ने इस बार निजाम को मजबूर किया कि वो कुरान की कसम खाकर संधि की शर्तें दोहराए। ये मुगलों की अब तक की सबसे बड़ी हार थी और मराठों की सबसे बड़ी जीत।
लेखिका : शिवानी शाह
Sunday, 9 June 2019
बन्दा सिंह बहादुर बैरागी
#बन्दा_सिंह_बहादुर
#मातृभूमि_के_वीर_सपूत
बन्दा सिंह बहादुर बैरागी एक सिख सेनानायक थे। उन्हें बन्दा बहादुर,लक्ष्मन दास और माधो दास भी कहते हैं। वे पहले ऐसे सिख सेनापति हुए, जिन्होंने मुग़लों के अजेय होने के भ्रम को तोड़ा; छोटे साहबज़ादों की शहादत का बदला लिया और गुरु गोबिन्द सिंह द्वारा संकल्पित प्रभुसत्तासम्पन्न लोक राज्य की राजधानी लोहगढ़ में ख़ालसा राज की नींव रखी। यही नहीं, उन्होंने गुरु नानक देव और गुरू गोबिन्द सिंह के नाम से सिक्का और मोहरे जारी करके, निम्न वर्ग के लोगों की उच्च पद दिलाया और हल वाहक किसान-मज़दूरों को ज़मीन का मालिक बनाया।
बाबा बन्दा सिंह बहादुर का जन्म कश्मीर स्थित पुंछ जिले के तहसील राजौरी क्षेत्र में विक्रम संवत् 1727, कार्तिक शुक्ल 13 (1670 ई.) को हुआ था। बंदा बहादुर सिंह मिन्हास गोत्र के राजपूत है। उनका लक्ष्मणस था। लक्ष्मण देव के भाग्य में विद्या नहीं थी, लेकिन छोटी सी उम्र में पहाड़ी जवानों की भांति कुश्ती और शिकार आदि का बहुत शौक़ था। वह अभी 15 वर्ष की उम्र के ही थे कि ऎेक गर्भवती हिरणी के उनके हाथों हुए शिकार ने उने अतयंत शोक में ङाल दिया। इस घटना का उनके मन में गहरा प्रभाव पड़ा। वह अपना घर-बार छोड़कर ऎेक बेरागी बन गये। वह जानकी दास नाम के एक बैरागी के शिष्य हो गए और उनका नाम माधोदास बैरागी पड़ा। तदन्तर उन्होंने एक अन्य बाबा रामदास बैरागी का शिष्यत्व ग्रहण किया और कुछ समय तक पंचवटी (नासिक) में रहे। वहाँ एक औघड़नाथ से योग की शिक्षा प्राप्त कर वह पूर्व की ओर दक्षिण के नान्देड क्षेत्र को चला गए जहाँ गोदावरी के तट पर उन्होंने एक आश्रम की स्थापना की।
#राज्य_स्थापना_हेतु_आत्मबलिदान
बन्दा सिंह ने अपने राज्य के एक बड़े भाग पर फिर से अधिकार कर लिया और इसे उत्तर-पूर्व तथा पहाड़ी क्षेत्रों की ओर लाहौर और अमृतसर की सीमा तक विस्तृत किया। 1715 ई. के प्रारम्भ में बादशाह फ़र्रुख़सियर की शाही फ़ौज ने अब्दुल समद ख़ाँ के नेतृत्व में उन्हें गुरुदासपुर ज़िले के धारीवाल क्षेत्र के निकट गुरुदास नंगल गाँव में कई मास तक घेरे रखा। खाद्य सामग्री के अभाव के कारण उन्होंने 7 दिसम्बर को आत्मसमर्पण कर दिया। फ़रवरी 1716 को 794 सिक्खों के साथ वह दिल्ली लाये गए जहाँ 5 मार्च से 12 मार्च तक सात दिनों में 100 की संख्या में सिक्खों की बलि दी जाती रही । 16 जून को बादशाह फ़ार्रुख़शियार के आदेश से बन्दा सिंह तथा उनके मुख्य सैन्य-अधिकारियों के शरीर काटकर टुकड़े-टुकड़े कर दिये गये।
मरने से पूर्व बन्दा सिंह बहादुर जी ने अति प्राचीन ज़मींदारी प्रथा का अन्त कर दिया था तथा कृषकों को बड़े-बड़े जागीरदारों और ज़मींदारों की दासता से मुक्त कर दिया था। वह साम्प्रदायिकता की संकीर्ण भावनाओं से परे थे। मुसलमानों को राज्य में पूर्ण धार्मिक स्वातन्त्र्य दिया गया था। पाँच हज़ार मुसलमान भी उनकी सेना में थे। बन्दा सिंह ने पूरे राज्य में यह घोषणा कर दी थी कि वह किसी प्रकार भी मुसलमानों को क्षति नहीं पहुँचायेगे और वे सिक्ख सेना में अपनी नमाज़ पढ़ने और खुतवा करवाने में स्वतन्त्र होंगे।
बंदा बैरागी बलिदान दिन पर शत् शत् नमन ll
-हर्ष भट्ट / दर्शन ठक्कर
#bandabairagi #sikh #punjab
#मातृभूमि_के_वीर_सपूत
बन्दा सिंह बहादुर बैरागी एक सिख सेनानायक थे। उन्हें बन्दा बहादुर,लक्ष्मन दास और माधो दास भी कहते हैं। वे पहले ऐसे सिख सेनापति हुए, जिन्होंने मुग़लों के अजेय होने के भ्रम को तोड़ा; छोटे साहबज़ादों की शहादत का बदला लिया और गुरु गोबिन्द सिंह द्वारा संकल्पित प्रभुसत्तासम्पन्न लोक राज्य की राजधानी लोहगढ़ में ख़ालसा राज की नींव रखी। यही नहीं, उन्होंने गुरु नानक देव और गुरू गोबिन्द सिंह के नाम से सिक्का और मोहरे जारी करके, निम्न वर्ग के लोगों की उच्च पद दिलाया और हल वाहक किसान-मज़दूरों को ज़मीन का मालिक बनाया।
बाबा बन्दा सिंह बहादुर का जन्म कश्मीर स्थित पुंछ जिले के तहसील राजौरी क्षेत्र में विक्रम संवत् 1727, कार्तिक शुक्ल 13 (1670 ई.) को हुआ था। बंदा बहादुर सिंह मिन्हास गोत्र के राजपूत है। उनका लक्ष्मणस था। लक्ष्मण देव के भाग्य में विद्या नहीं थी, लेकिन छोटी सी उम्र में पहाड़ी जवानों की भांति कुश्ती और शिकार आदि का बहुत शौक़ था। वह अभी 15 वर्ष की उम्र के ही थे कि ऎेक गर्भवती हिरणी के उनके हाथों हुए शिकार ने उने अतयंत शोक में ङाल दिया। इस घटना का उनके मन में गहरा प्रभाव पड़ा। वह अपना घर-बार छोड़कर ऎेक बेरागी बन गये। वह जानकी दास नाम के एक बैरागी के शिष्य हो गए और उनका नाम माधोदास बैरागी पड़ा। तदन्तर उन्होंने एक अन्य बाबा रामदास बैरागी का शिष्यत्व ग्रहण किया और कुछ समय तक पंचवटी (नासिक) में रहे। वहाँ एक औघड़नाथ से योग की शिक्षा प्राप्त कर वह पूर्व की ओर दक्षिण के नान्देड क्षेत्र को चला गए जहाँ गोदावरी के तट पर उन्होंने एक आश्रम की स्थापना की।
#राज्य_स्थापना_हेतु_आत्मबलिदान
बन्दा सिंह ने अपने राज्य के एक बड़े भाग पर फिर से अधिकार कर लिया और इसे उत्तर-पूर्व तथा पहाड़ी क्षेत्रों की ओर लाहौर और अमृतसर की सीमा तक विस्तृत किया। 1715 ई. के प्रारम्भ में बादशाह फ़र्रुख़सियर की शाही फ़ौज ने अब्दुल समद ख़ाँ के नेतृत्व में उन्हें गुरुदासपुर ज़िले के धारीवाल क्षेत्र के निकट गुरुदास नंगल गाँव में कई मास तक घेरे रखा। खाद्य सामग्री के अभाव के कारण उन्होंने 7 दिसम्बर को आत्मसमर्पण कर दिया। फ़रवरी 1716 को 794 सिक्खों के साथ वह दिल्ली लाये गए जहाँ 5 मार्च से 12 मार्च तक सात दिनों में 100 की संख्या में सिक्खों की बलि दी जाती रही । 16 जून को बादशाह फ़ार्रुख़शियार के आदेश से बन्दा सिंह तथा उनके मुख्य सैन्य-अधिकारियों के शरीर काटकर टुकड़े-टुकड़े कर दिये गये।
मरने से पूर्व बन्दा सिंह बहादुर जी ने अति प्राचीन ज़मींदारी प्रथा का अन्त कर दिया था तथा कृषकों को बड़े-बड़े जागीरदारों और ज़मींदारों की दासता से मुक्त कर दिया था। वह साम्प्रदायिकता की संकीर्ण भावनाओं से परे थे। मुसलमानों को राज्य में पूर्ण धार्मिक स्वातन्त्र्य दिया गया था। पाँच हज़ार मुसलमान भी उनकी सेना में थे। बन्दा सिंह ने पूरे राज्य में यह घोषणा कर दी थी कि वह किसी प्रकार भी मुसलमानों को क्षति नहीं पहुँचायेगे और वे सिक्ख सेना में अपनी नमाज़ पढ़ने और खुतवा करवाने में स्वतन्त्र होंगे।
बंदा बैरागी बलिदान दिन पर शत् शत् नमन ll
-हर्ष भट्ट / दर्शन ठक्कर
#bandabairagi #sikh #punjab
Saturday, 4 May 2019
4 मई -बुंदेलखंड के महाराजा छत्रसाल जन्मदिन..
4 मई -बुंदेलखंड के महाराजा छत्रसाल जन्मदिन..
17वीं सदी में परदेशी मुग़ल बादशाहों के राज को अस्वीकार कर अपनी मिट्टी पे अपना स्वराज स्थापित करने के लिए दक्षिण छत्रपति शिवाजी महाराज और उत्तर में महाराज छत्रसाल को सम्मान से याद किया जाता है। महाराजा छत्रसाल ने शिवाजी महाराज से प्रेरणा ले मुग़लों के विरुद्ध मोर्चा खड़ा किया और अपनी स्वतंत्रता के लिए कटिबद्ध हुए। उन्हों ने अपनी लड़ाई की शुरुआत महज़ 5 घुड़सवार और 25 सैनिक के साथ की थी। फिर भी इस बहादुर योद्धा ने मुग़लों को कई बार धूल चटाई और स्वतंत्र बुंदेलखंड की स्थापना की। औरंगजेब छत्रसाल को पराजित करने में सफल नहीं हो पाया। उसने रणदूलह के नेतृत्व में 30 हजार सैनिकों की टुकडी मुगल सरदारों के साथ छत्रसाल का पीछा करने के लिए भेजी थी। छत्रसाल अपने रणकौशल व छापामार युद्ध नीति के बल पर मुगलों के छक्के छुड़ाता रहा। छत्रसाल को मालूम था कि मुगल छलपूर्ण घेराबंदी में सिद्धहस्त है। उनके पिता चंपतराय मुग़लों से धोखा खा चुके थे। छत्रसाल ने मुगल सेना से इटावा, खिमलासा, गढ़ाकोटा, धामौनी, रामगढ़, कंजिया, मडियादो, रहली, रानगिरि, शाहगढ़, वांसाकला सहित अनेक स्थानों पर लड़ाई लड़ी। छत्रसाल की शक्ति बढ़ती गयी। बन्दी बनाये गये मुगल सरदारों से छत्रसाल ने दंड वसूला और उन्हें मुक्त कर दिया। बुन्देलखंड से मुगलों का एकछत्र शासन छत्रसाल ने समाप्त कर दिया। महाराजा छत्रसाल ने अपनी बेटी मस्तानी का विवाह बाज़ीराव पेश्वा से कर बुंदेला और मराठा में नए सबँध बांधे थे। अपने अग़म्य साहस और शक्ति के लिए बुंदेलखंड केसरी महाराजा छत्रसाल हमेशा इतिहास के पन्नों में और हमारे हृदय में अमर रहेंगे..
शत् शत् नमन..
#maharajachhatrasal #bundelkhand #vir #bharatmatakijay
Monday, 14 May 2018
*15 मई/जन्म-दिवस, क्रांतिवीर सुखदेव थापर।*
*शत्-शत् नमन 15 मई/जन्म-दिवस, क्रांतिवीर सुखदेव थापर।*
स्वतन्त्रता संग्राम के समय उत्तर भारत में क्रान्तिकारियों की दो त्रिमूर्तियाँ बहुत प्रसिद्ध हुईं। पहली चन्द्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल तथा अशफाक उल्ला खाँ की थी, जबकि दूसरी भगतसिंह, सुखदेव तथा राजगुरु की थी। इनमें से सुखदेव का जन्म ग्राम नौघरा (जिला लायलपुर, पंजाब, वर्तमान पाकिस्तान) में 15 मई, 1907 को हुआ था। इनके पिता प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता श्री रामलाल थापर तथा माता श्रीमती रल्ली देई थीं।
सुखदेव के जन्म के दो साल बाद ही पिता का देहान्त हो गया। अतः इनका लालन-पालन चाचा श्री अचिन्तराम थापर ने किया। सुखदेव के जन्म के समय वे जेल में मार्शल लाॅ की सजा भुगत रहे थे। ऐसे क्रान्तिकारी वातावरण में सुखदेव बड़ा हुए।
जब वह तीसरी कक्षा में थे, तो गवर्नर उनके विद्यालय में आये। प्रधानाचार्य के आदेश पर सब छात्रों ने गवर्नर को सैल्यूट दिया, पर सुखदेव ने ऐसा नहीं किया। जब उनसे पूछताछ हुई, तो उन्होंने साफ कह दिया कि मैं किसी अंग्रेज को प्रणाम नहीं करूँगा।
आगे चलकर सुखदेव और भगतसिंह मिलकर लाहौर में क्रान्ति का तानाबाना बुनने लगे। उन्होंने एक कमरा किराये पर ले लिया। वे प्रायः रात में बाहर रहते थे या देर से आते थे। इससे मकान मालिक और पड़ोसियों को सन्देह होता था। इस समस्या के समाधान के लिए सुखदेव अपनी माता जी को वहाँ ले आये। अब यदि कोई पूछता, तो वे कहतीं कि दोनों पी.डब्ल्यू.डी. में काम करते हैं। नगर से बहुत दूर एक सड़क बन रही है। वहाँ दिन-रात काम चल रहा है, इसलिए इन्हें आने में प्रायः देर हो जाती है।
सुखदेव बहुत साहसी थे। लाहौर में जब बम बनाने का काम प्रारम्भ हुआ, तो उसके लिए कच्चा माल फिरोजपुर से वही लाते थे। एक बार माल लाते समय वे सिपाहियों के डिब्बे में चढ़ गये। उन्होंने सुखदेव को बहुत मारा। सुखदेव चुपचाप पिटते रहे, पर कुछ बोले नहीं, क्योंकि उनके थैले में पिस्तौल, कारतूस तथा बम बनाने का सामान था। एक सिपाही ने पूछा कि इस थैले में क्या है ? सुखदेव ने त्वरित बुद्धि का प्रयोग करते हुए हँसकर कहा - ~दीवान जी, पिस्तौल और कारतूस हैं।~ सिपाही भी हँस पड़े और बात टल गयी।
जब साइमन कमीशन विरोधी प्रदर्शन के समय लाठी प्रहार से घायल होकर लाला लाजपतराय की मृत्यु हुई, तो सांडर्स को मारने वालों में सुखदेव भी थे। उनके हाथ पर ॐ गुदा हुआ था। फरारी के दिनों में एक दिन उन्होंने वहाँ खूब सारा तेजाब लगा लिया। इससे वहाँ गहरे जख्म हो गये, पर फिर भी ॐ पूरी तरह साफ नहीं हुआ। इस पर उन्होंने मोमबत्ती से उस भाग को जला दिया।
पूछने पर उन्होंने मस्ती से कहा कि इससे मेरी पहचान मिट गयी और पकड़े जाने पर यातनाओं से मैं डर तो नहीं जाऊँगा, इसकी परीक्षा भी हो गयी। उन्हें पता लगा कि भेद उगलवाने के लिए पुलिस वाले कई दिन तक खड़ा रखते हैं। अतः उन्होंने खड़े-खड़े सोने का अभ्यास भी कर लिया।
जब भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु को फाँसी घोषित हो गयी, तो जनता ने इसके विरोध में आन्दोलन किया। लोगों की इच्छा थी कि इन्हें फाँसी के बदले कुछ कम सजा दी जाये। जब सुखदेव को यह पता लगा, तो उन्होंने लिखा, ‘‘हमारी सजा को बदल देने से देश का उतना कल्याण नहीं होगा, जितना फाँसी पर चढ़ने से।’ ’स्पष्ट है कि उन्होंने बलिदानी बाना पहन लिया था।
23 मार्च, 1931 को भगतसिंह और राजगुरु के साथ सुखदेव भी हँसते हुए फाँसी के फन्दे पर झूल
गये।
स्वतन्त्रता संग्राम के समय उत्तर भारत में क्रान्तिकारियों की दो त्रिमूर्तियाँ बहुत प्रसिद्ध हुईं। पहली चन्द्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल तथा अशफाक उल्ला खाँ की थी, जबकि दूसरी भगतसिंह, सुखदेव तथा राजगुरु की थी। इनमें से सुखदेव का जन्म ग्राम नौघरा (जिला लायलपुर, पंजाब, वर्तमान पाकिस्तान) में 15 मई, 1907 को हुआ था। इनके पिता प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता श्री रामलाल थापर तथा माता श्रीमती रल्ली देई थीं।
सुखदेव के जन्म के दो साल बाद ही पिता का देहान्त हो गया। अतः इनका लालन-पालन चाचा श्री अचिन्तराम थापर ने किया। सुखदेव के जन्म के समय वे जेल में मार्शल लाॅ की सजा भुगत रहे थे। ऐसे क्रान्तिकारी वातावरण में सुखदेव बड़ा हुए।
जब वह तीसरी कक्षा में थे, तो गवर्नर उनके विद्यालय में आये। प्रधानाचार्य के आदेश पर सब छात्रों ने गवर्नर को सैल्यूट दिया, पर सुखदेव ने ऐसा नहीं किया। जब उनसे पूछताछ हुई, तो उन्होंने साफ कह दिया कि मैं किसी अंग्रेज को प्रणाम नहीं करूँगा।
आगे चलकर सुखदेव और भगतसिंह मिलकर लाहौर में क्रान्ति का तानाबाना बुनने लगे। उन्होंने एक कमरा किराये पर ले लिया। वे प्रायः रात में बाहर रहते थे या देर से आते थे। इससे मकान मालिक और पड़ोसियों को सन्देह होता था। इस समस्या के समाधान के लिए सुखदेव अपनी माता जी को वहाँ ले आये। अब यदि कोई पूछता, तो वे कहतीं कि दोनों पी.डब्ल्यू.डी. में काम करते हैं। नगर से बहुत दूर एक सड़क बन रही है। वहाँ दिन-रात काम चल रहा है, इसलिए इन्हें आने में प्रायः देर हो जाती है।
सुखदेव बहुत साहसी थे। लाहौर में जब बम बनाने का काम प्रारम्भ हुआ, तो उसके लिए कच्चा माल फिरोजपुर से वही लाते थे। एक बार माल लाते समय वे सिपाहियों के डिब्बे में चढ़ गये। उन्होंने सुखदेव को बहुत मारा। सुखदेव चुपचाप पिटते रहे, पर कुछ बोले नहीं, क्योंकि उनके थैले में पिस्तौल, कारतूस तथा बम बनाने का सामान था। एक सिपाही ने पूछा कि इस थैले में क्या है ? सुखदेव ने त्वरित बुद्धि का प्रयोग करते हुए हँसकर कहा - ~दीवान जी, पिस्तौल और कारतूस हैं।~ सिपाही भी हँस पड़े और बात टल गयी।
जब साइमन कमीशन विरोधी प्रदर्शन के समय लाठी प्रहार से घायल होकर लाला लाजपतराय की मृत्यु हुई, तो सांडर्स को मारने वालों में सुखदेव भी थे। उनके हाथ पर ॐ गुदा हुआ था। फरारी के दिनों में एक दिन उन्होंने वहाँ खूब सारा तेजाब लगा लिया। इससे वहाँ गहरे जख्म हो गये, पर फिर भी ॐ पूरी तरह साफ नहीं हुआ। इस पर उन्होंने मोमबत्ती से उस भाग को जला दिया।
पूछने पर उन्होंने मस्ती से कहा कि इससे मेरी पहचान मिट गयी और पकड़े जाने पर यातनाओं से मैं डर तो नहीं जाऊँगा, इसकी परीक्षा भी हो गयी। उन्हें पता लगा कि भेद उगलवाने के लिए पुलिस वाले कई दिन तक खड़ा रखते हैं। अतः उन्होंने खड़े-खड़े सोने का अभ्यास भी कर लिया।
जब भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु को फाँसी घोषित हो गयी, तो जनता ने इसके विरोध में आन्दोलन किया। लोगों की इच्छा थी कि इन्हें फाँसी के बदले कुछ कम सजा दी जाये। जब सुखदेव को यह पता लगा, तो उन्होंने लिखा, ‘‘हमारी सजा को बदल देने से देश का उतना कल्याण नहीं होगा, जितना फाँसी पर चढ़ने से।’ ’स्पष्ट है कि उन्होंने बलिदानी बाना पहन लिया था।
23 मार्च, 1931 को भगतसिंह और राजगुरु के साथ सुखदेव भी हँसते हुए फाँसी के फन्दे पर झूल
गये।
Wednesday, 2 May 2018
શું કહેવું એ ન સમજાય ત્યારે કંઈ જ ન કહેવું!
સવાલ જ ખોટો હોય તો એનો સાચો જવાબ ક્યાંથી આપવો? સંબંધોમાં પણ ક્યારેક એવા સવાલો પૂછાતા હોય છે કે આપણને સમજ ન પડે કે હવે મારે આને શું કહેવું? વાંચો, ‘ચિંતનની પળે.’
શું કહેવું એ ન સમજાય
ત્યારે કંઈ જ ન કહેવું!
ચિંતનની પળે : કૃષ્ણકાંત ઉનડકટ
કેટલા હસમુખ હતા ને કેવા દીવાના હતા,
આપણે જ્યારે જીવનમાં એકબીજાના હતા,
કેટલું સમજાવશે એ લોકને તું પણ ‘આદિલ’,
તારા પોતાના તને ક્યાંથી સમજવાના હતા.
-આદિલ મન્સુરી
સંબંધો ક્યારેક વિચિત્ર, બેહૂદા,અયોગ્ય અને ગેરવાજબી સવાલો આપણી સામે લાવે છે. આપણને થાય કે હવે આમાં શું કહેવું? કહેવા જેવું જ કંઈ ન હોય ત્યારે નીકળતો નિસાસો ઘણું બધું બયાન કરી દેતો હોય છે. સવાલ જ ખોટો હોય તો એનો સાચો જવાબ ક્યાંથી આપવો? આખી જિંદગી જેના માટે ઘસાયા હોઈએ, દરેક ક્ષણે જેનું ભલું ઇચ્છ્યું હોય, જેના સુખ માટે દરેક દુ:ખ વેઠ્યું હોય એ વ્યક્તિ જ્યારે કહે કે, તમે મારા માટે શું કર્યું? તમે તો બધું તમારા સ્વાર્થ માટે જ કર્યું છે ત્યારે શું કર્યું એ સવાલ નહીં, પણ આક્ષેપ બની જાય છે. આપણને થાય કે મારા ઉપર એવો આક્ષેપ કે મેં મારા સ્વાર્થ માટે બધું કર્યું છે! આક્ષેપ ખોટો હોય ત્યારે શબ્દો સોંસરવા ઊતરી જતા હોય છે અને આપણી અંદર ઘણુંબધું વેતરી નાખતાં હોય છે.
સારી દાનતનો બદલો હંમેશાં સારો જ મળે એવું જરૂરી નથી. આપણે ગમે એટલા સારા ઇરાદાથી કંઈ કરતાં હોઇએ, પણ સામેની વ્યક્તિ એને એ જ રીતે લે એવું ન પણ બને. અત્યારનો સમય જ એવો છે કે આપણે કોઈના માટે કોઈ સ્વાર્થ વગર કંઈ કરીએ તો પણ એને શંકા જાય કે એ મારા માટે આટલું બધું શા માટે કરે છે? એનો કંઈક સ્વાર્થ હોવો જોઈએ, નહીંતર કોઈ આટલું થોડું કરે? દાનત અને ઇરાદા દર વખતે ખરાબ જ નથી હોતાં. સારા લોકો ઓછા હશે પણ સારા લોકો નથી જ એવું માનવું સાચું નથી. આપણને ખરાબ અનુભવો વધારે થયા હોય છે એટલે આપણે સારા અનુભવો સામે પણ શંકા કરતાં હોઈએ છીએ. આપણે ક્યારેક કોઈ પણ જાતના સ્વાર્થ વગર કંઈ કરતાં હોઈએ તો પણ આપણે ક્યારેક શંકાના દાયકામાં આવતા હોઈએ છીએ.
એક અંકલની આ વાત છે. એ એક ગરીબ છોકરીને ભણવામાં અને આગળ વધવામાં બધી જ મદદ કરે. તેની કોલેજની ફી ભરી દે. ટ્યૂશન રખાવી દે. ભણી લીધું પછી નોકરી અપાવવામાં પણ મદદ કરી. એ છોકરીને સમજાય નહીં કે આ અંકલ મારા માટે આટલું બધું શા માટે કરે છે? છોકરીને એવો પણ વિચાર આવી જતો કે આવું કરવા પાછળ અંકલનો કોઈ બદઇરાદો તો નહીં હોય ને? ઘણો સમય ચાલ્યો ગયો, પણ અંકલ તરફથી કોઈ જ એવું વર્તન ન થયું. એક દિવસ છોકરીથી ન રહેવાયું. તેણે અંકલને પૂછ્યું કે તમે મારા માટે આટલું બધું શા માટે કર્યું? અંકલે સામે પૂછ્યું, તને શું લાગે છે? મારો કોઈ સ્વાર્થ હતો? હવે હું તને જે સાચી વાત છે એ કહું છું, તારે જે સમજવું હોય એ સમજજે.
અંકલે કહ્યું, હું નાનો હતો ત્યારે મારો પરિવાર મને ભણાવી શકે એમ ન હતો. મારા પિતા એક ઘરમાં કામ કરતા હતા. એ ઘરમાં એક મોટી ઉંમરના લેડી હતાં. મને જોઈને એમણે મારા પિતાને કહ્યું કે, આને હું ભણાવીશ. તેણે મારો બધો ખર્ચ ઉઠાવ્યો. મને સારી રીતે ભણાવ્યો. મને થતું કે આ મહિલાનું ઋણ હું કેવી રીતે ઉતારીશ? એવું પણ થતું કે સારી જોબ મળે એ પછી હું એનું ધ્યાન રાખીશ. જોકે, એને તો એવી કોઈ જરૂર જ ન હતી. હું એમના માટે કંઈ કરું એ પહેલાં તો એ મૃત્યુ પામ્યાં. હું એના માટે કંઈ જ ન કરી શક્યો. એ સમયે મેં નક્કી કર્યું કે, એમણે મારા માટે જે કર્યું છે એ હું કોઈના માટે કરીશ. એમાં તું મને મળી ગઈ. તને જ્યારે જોઉં છું ત્યારે એ મહાન મહિલાનો ચહેરો મારી સામે આવી જાય છે. હા, તું એવું કહી શકે કે એનું ઋણ ઉતારવા મેં તારા માટે મારાથી થાય એ કર્યું. એને તું મારો સ્વાર્થ કહી શકે. દીકરા, દરેક કામ પાછળ કંઈક કારણ હોય જ છે, પણ એ કારણ સારું પણ હોઇ શકે!
સારાં કારણો ઘણી વખત સાબિત થાય એ પહેલાં જ શંકા બની જતાં હોય છે. એક છોકરીની આ વાત છે. એનાં મા-બાપ ગામડાંમાં રહેતાં હતાં. છોકરી ભણવામાં હોશિયાર હતી. ગામડામાં કોલેજ ન હતી. છોકરીનાં કાકા-કાકી શહેરમાં રહેતાં હતાં. ભત્રીજી ભણી શકે એટલે બંનેએ તેને શહેરમાં બોલાવી લીધી. છોકરીએ કોલેજ પૂરી કરી. સારી જોબ મળી ગઈ. એણે નક્કી કર્યું કે હવે એ મકાન ભાડે રાખી પોતાની રીતે રહેશે. ઘર છોડ્યા પછી તેણે સગાંવહાલાંઓને એવી વાતો કરવી શરૂ કરી કે, કાકી તો મારી પાસે બહુ કામ કરાવતાં. મારા ઉપર બહુ સ્ટ્રીક્ટ હતાં. મને સાંજ પછી બહાર જ ન જવા દેતાં. મારો મોબાઇલ ચેક કરતાં કે હું કોની સાથે સંપર્કમાં છું. કાકીને આ વાતની ખબર પડી ત્યારે એ ધ્રુસકે ધ્રુસકે રડી પડ્યાં. મેં એના માટે આટલું કર્યું એનો આવો બદલો? હા મેં એને સાંજ પછી બહાર જવા નથી દીધી, એનો ફોન ચેક કર્યો છે, પણ એની પાછળ મારો ઇરાદો કંઈ ખરાબ ન હતો! એ ખોટી સંગતે ચડી ન જાય એવી જ દાનત હતી. મારા પેટની જણી દીકરી હોત તો પણ હું આવું જ કરત! એ કામ શીખે એ માટે એની પાસે કામ કરાવતી. પતિ પાસે એ ગળગળી થઈ ગઈ. એણે કહ્યું કે, હવે મારે એને શું કહેવું એ જ મને સમજાતું નથી. પતિએ શાંતિથી કહ્યું કે, જ્યારે શું કહેવું એ ન સમજાયને ત્યારે કંઈ જ ન કહેવું. અમુક સવાલોના જવાબ સમય જ આપતો હોય છે અને કદાચ સમય પણ જવાબ ન આપે તો કંઈ નહીં, તને ખબર છે ને કે તારી દાનત સારી હતી,તારો ઇરાદો ખરાબ ન હતો. મને ખબર છે કે તેં એના માટે કેટલી ચિંતા કરી છે. બાકી બધું કુદરત ઉપર છોડી દે!
આપણે પણ એવું કહેતા હોઈએ છીએ કે કુદરત બધું જુએ છે. જોકે, કુદરત જવાબ નથી આપતો કે એણે સારા માટે બધું કર્યું હતું. કુદરત પુરાવા પણ નથી આપતો. આપણને તો જવાબ જોઈતો હોય છે. સારું કર્યું હોય અને કોઈ સારું ન કહે તો પણ આપણે ક્યારેક જતું કરીએ છીએ, પણ સારું કર્યું હોય અને કોઈ ખરાબ કહે ત્યારે આપણને આકરું લાગતું હોય છે. આકરું લાગે એ સ્વાભાવિક પણ છે. આવું થાય ત્યારે આપણે ખુલાસાઓ કરીએ છીએ કે મેં તો સારા માટે કર્યું હતું. ક્યારેક ઉકળાટ ઠાલવીએ છીએ કે આવું કરવાનું? તને કંઈ બોલતાં પહેલાં જરાયે વિચાર ન આવ્યો? સારું ન બોલવું હોય તો ન બોલ પણ મન ફાવે એવું તો ન બોલ.
દરેક વખતે કોઈના ઇરાદાઓ પણ ચકાસવા ન જોઈએ. કોઈની દાનત પ્રત્યે પણ શંકા ન કરવી જોઈએ. જો એ કોઈ બદઇરાદાથી કે ખરાબ દાનતથી કંઈ કરતાં હશે તો એ છતાં થયા વગર રહેશે જ નહીં. જે જવાબ આપવો હોય એ ત્યારે ક્યાં નથી અપાતો? આપણને શંકા કરવાની એટલી બધી આદત પડી ગઈ છે કે આપણે એ સ્વીકારી જ નથી શકતાં કે કોઈ કારણ વગર કોઈ કંઈક સારું કરે! હવે બીજો સવાલ, તમે કોઈના માટે કોઈ કારણ વગર કંઈ કરો છો?કોઈને જોઈને તમને એવું થયું હોય કે આના માટે હું મારાથી બને એ બધું જ કરીશ. કોઈના પ્રત્યે આપણને લાગણી હોય છે, કોઈ આપણને ગમતું હોય છે, કોઈ આપણને સારું લાગતું હોય છે એટલે આપણે એના માટે આપણાથી થાય એ બધું કરતાં હોઈએ છીએ. પડોશીનો નાનો દીકરો કે દીકરી મોડી રાતે આઇસક્રીમ ખાવાની વાત કરે ત્યારે ઘણી વખત આપણે થાકી ગયા હોઈએ તો પણ એના માટે આઇસક્રીમ લેવા જઈએ છીએ. કયો સ્વાર્થ હોય છે એમાં? આઇસક્રીમ એને હાથમાં આપતી વખતે એના ચહેરા પર જે ખુશી દેખાય છે અને આપણને એની ખુશી જોઈને જે આનંદની અનુભૂતિ થાય છે એ અલૌકિક હોય છે. મોટા થઈ ગયા પછી પણ કોઈને એવું હોય છે કે એ ખુશ રહે. એના ચહેરા પર આનંદ જોઈને એવી જ અનુભૂતિ થતી હોય છે.
ક્યારેક એવું બને કે સારા કામનો બદલો ખરાબ શબ્દોથી મળે. મેં એના માટે આટલું કર્યું અને એણે સારા પ્રસંગે મને બોલાવ્યો પણ નહીં, યાદ પણ ન કર્યો. દુ:ખ થાય એ બહુ જ સ્વાભાવિક છે. જેના માટે આપણે કંઈક કર્યું હોય એને ક્યારેક મોડું સમજાય અને ક્યારેક આખી જિંદગી ન પણ સમજાય. જે કર્યું હોય એનો અફસોસ ન કરવો. સારું કરવાથી સારું થાય છે, જોકે એ જરૂરી નથી કે જેનું સારું કર્યું હોય એની પાસેથી જ એ થાય! બાય ધ વે, તમારા માટે કોઈએ કંઈ કર્યું હોય એ તમને યાદ છે? એનું વળતર ન વાળો તો કંઈ નહીં, એટલિસ્ટ એનો આભાર તો જરૂર માનજો. માણસને માણસ જાત પ્રત્યે વિશ્વાસ રહે એવું કરવાની જવાબદારી પણ આખરે માણસની જ હોય છે!
છેલ્લો સીન :
તમને ક્યારેય એવો વિચાર આવ્યો છે કે, દુનિયાના બધા જ લોકો સ્વાર્થી અને મતલબી છે? તો તમારી જાતને જ એવો સવાલ પૂછજો કે હું કેવો છું? -કેયુ
(‘દિવ્ય ભાસ્કર’, ‘કળશ’ પૂર્તિ, તા. 02 મે 2018, બુધવાર, ‘ચિંતનની પળે’ કોલમ)
onlyrumit2802@gmail.com
શું કહેવું એ ન સમજાય
ત્યારે કંઈ જ ન કહેવું!
ચિંતનની પળે : કૃષ્ણકાંત ઉનડકટ
કેટલા હસમુખ હતા ને કેવા દીવાના હતા,
આપણે જ્યારે જીવનમાં એકબીજાના હતા,
કેટલું સમજાવશે એ લોકને તું પણ ‘આદિલ’,
તારા પોતાના તને ક્યાંથી સમજવાના હતા.
-આદિલ મન્સુરી
સંબંધો ક્યારેક વિચિત્ર, બેહૂદા,અયોગ્ય અને ગેરવાજબી સવાલો આપણી સામે લાવે છે. આપણને થાય કે હવે આમાં શું કહેવું? કહેવા જેવું જ કંઈ ન હોય ત્યારે નીકળતો નિસાસો ઘણું બધું બયાન કરી દેતો હોય છે. સવાલ જ ખોટો હોય તો એનો સાચો જવાબ ક્યાંથી આપવો? આખી જિંદગી જેના માટે ઘસાયા હોઈએ, દરેક ક્ષણે જેનું ભલું ઇચ્છ્યું હોય, જેના સુખ માટે દરેક દુ:ખ વેઠ્યું હોય એ વ્યક્તિ જ્યારે કહે કે, તમે મારા માટે શું કર્યું? તમે તો બધું તમારા સ્વાર્થ માટે જ કર્યું છે ત્યારે શું કર્યું એ સવાલ નહીં, પણ આક્ષેપ બની જાય છે. આપણને થાય કે મારા ઉપર એવો આક્ષેપ કે મેં મારા સ્વાર્થ માટે બધું કર્યું છે! આક્ષેપ ખોટો હોય ત્યારે શબ્દો સોંસરવા ઊતરી જતા હોય છે અને આપણી અંદર ઘણુંબધું વેતરી નાખતાં હોય છે.
સારી દાનતનો બદલો હંમેશાં સારો જ મળે એવું જરૂરી નથી. આપણે ગમે એટલા સારા ઇરાદાથી કંઈ કરતાં હોઇએ, પણ સામેની વ્યક્તિ એને એ જ રીતે લે એવું ન પણ બને. અત્યારનો સમય જ એવો છે કે આપણે કોઈના માટે કોઈ સ્વાર્થ વગર કંઈ કરીએ તો પણ એને શંકા જાય કે એ મારા માટે આટલું બધું શા માટે કરે છે? એનો કંઈક સ્વાર્થ હોવો જોઈએ, નહીંતર કોઈ આટલું થોડું કરે? દાનત અને ઇરાદા દર વખતે ખરાબ જ નથી હોતાં. સારા લોકો ઓછા હશે પણ સારા લોકો નથી જ એવું માનવું સાચું નથી. આપણને ખરાબ અનુભવો વધારે થયા હોય છે એટલે આપણે સારા અનુભવો સામે પણ શંકા કરતાં હોઈએ છીએ. આપણે ક્યારેક કોઈ પણ જાતના સ્વાર્થ વગર કંઈ કરતાં હોઈએ તો પણ આપણે ક્યારેક શંકાના દાયકામાં આવતા હોઈએ છીએ.
એક અંકલની આ વાત છે. એ એક ગરીબ છોકરીને ભણવામાં અને આગળ વધવામાં બધી જ મદદ કરે. તેની કોલેજની ફી ભરી દે. ટ્યૂશન રખાવી દે. ભણી લીધું પછી નોકરી અપાવવામાં પણ મદદ કરી. એ છોકરીને સમજાય નહીં કે આ અંકલ મારા માટે આટલું બધું શા માટે કરે છે? છોકરીને એવો પણ વિચાર આવી જતો કે આવું કરવા પાછળ અંકલનો કોઈ બદઇરાદો તો નહીં હોય ને? ઘણો સમય ચાલ્યો ગયો, પણ અંકલ તરફથી કોઈ જ એવું વર્તન ન થયું. એક દિવસ છોકરીથી ન રહેવાયું. તેણે અંકલને પૂછ્યું કે તમે મારા માટે આટલું બધું શા માટે કર્યું? અંકલે સામે પૂછ્યું, તને શું લાગે છે? મારો કોઈ સ્વાર્થ હતો? હવે હું તને જે સાચી વાત છે એ કહું છું, તારે જે સમજવું હોય એ સમજજે.
અંકલે કહ્યું, હું નાનો હતો ત્યારે મારો પરિવાર મને ભણાવી શકે એમ ન હતો. મારા પિતા એક ઘરમાં કામ કરતા હતા. એ ઘરમાં એક મોટી ઉંમરના લેડી હતાં. મને જોઈને એમણે મારા પિતાને કહ્યું કે, આને હું ભણાવીશ. તેણે મારો બધો ખર્ચ ઉઠાવ્યો. મને સારી રીતે ભણાવ્યો. મને થતું કે આ મહિલાનું ઋણ હું કેવી રીતે ઉતારીશ? એવું પણ થતું કે સારી જોબ મળે એ પછી હું એનું ધ્યાન રાખીશ. જોકે, એને તો એવી કોઈ જરૂર જ ન હતી. હું એમના માટે કંઈ કરું એ પહેલાં તો એ મૃત્યુ પામ્યાં. હું એના માટે કંઈ જ ન કરી શક્યો. એ સમયે મેં નક્કી કર્યું કે, એમણે મારા માટે જે કર્યું છે એ હું કોઈના માટે કરીશ. એમાં તું મને મળી ગઈ. તને જ્યારે જોઉં છું ત્યારે એ મહાન મહિલાનો ચહેરો મારી સામે આવી જાય છે. હા, તું એવું કહી શકે કે એનું ઋણ ઉતારવા મેં તારા માટે મારાથી થાય એ કર્યું. એને તું મારો સ્વાર્થ કહી શકે. દીકરા, દરેક કામ પાછળ કંઈક કારણ હોય જ છે, પણ એ કારણ સારું પણ હોઇ શકે!
સારાં કારણો ઘણી વખત સાબિત થાય એ પહેલાં જ શંકા બની જતાં હોય છે. એક છોકરીની આ વાત છે. એનાં મા-બાપ ગામડાંમાં રહેતાં હતાં. છોકરી ભણવામાં હોશિયાર હતી. ગામડામાં કોલેજ ન હતી. છોકરીનાં કાકા-કાકી શહેરમાં રહેતાં હતાં. ભત્રીજી ભણી શકે એટલે બંનેએ તેને શહેરમાં બોલાવી લીધી. છોકરીએ કોલેજ પૂરી કરી. સારી જોબ મળી ગઈ. એણે નક્કી કર્યું કે હવે એ મકાન ભાડે રાખી પોતાની રીતે રહેશે. ઘર છોડ્યા પછી તેણે સગાંવહાલાંઓને એવી વાતો કરવી શરૂ કરી કે, કાકી તો મારી પાસે બહુ કામ કરાવતાં. મારા ઉપર બહુ સ્ટ્રીક્ટ હતાં. મને સાંજ પછી બહાર જ ન જવા દેતાં. મારો મોબાઇલ ચેક કરતાં કે હું કોની સાથે સંપર્કમાં છું. કાકીને આ વાતની ખબર પડી ત્યારે એ ધ્રુસકે ધ્રુસકે રડી પડ્યાં. મેં એના માટે આટલું કર્યું એનો આવો બદલો? હા મેં એને સાંજ પછી બહાર જવા નથી દીધી, એનો ફોન ચેક કર્યો છે, પણ એની પાછળ મારો ઇરાદો કંઈ ખરાબ ન હતો! એ ખોટી સંગતે ચડી ન જાય એવી જ દાનત હતી. મારા પેટની જણી દીકરી હોત તો પણ હું આવું જ કરત! એ કામ શીખે એ માટે એની પાસે કામ કરાવતી. પતિ પાસે એ ગળગળી થઈ ગઈ. એણે કહ્યું કે, હવે મારે એને શું કહેવું એ જ મને સમજાતું નથી. પતિએ શાંતિથી કહ્યું કે, જ્યારે શું કહેવું એ ન સમજાયને ત્યારે કંઈ જ ન કહેવું. અમુક સવાલોના જવાબ સમય જ આપતો હોય છે અને કદાચ સમય પણ જવાબ ન આપે તો કંઈ નહીં, તને ખબર છે ને કે તારી દાનત સારી હતી,તારો ઇરાદો ખરાબ ન હતો. મને ખબર છે કે તેં એના માટે કેટલી ચિંતા કરી છે. બાકી બધું કુદરત ઉપર છોડી દે!
આપણે પણ એવું કહેતા હોઈએ છીએ કે કુદરત બધું જુએ છે. જોકે, કુદરત જવાબ નથી આપતો કે એણે સારા માટે બધું કર્યું હતું. કુદરત પુરાવા પણ નથી આપતો. આપણને તો જવાબ જોઈતો હોય છે. સારું કર્યું હોય અને કોઈ સારું ન કહે તો પણ આપણે ક્યારેક જતું કરીએ છીએ, પણ સારું કર્યું હોય અને કોઈ ખરાબ કહે ત્યારે આપણને આકરું લાગતું હોય છે. આકરું લાગે એ સ્વાભાવિક પણ છે. આવું થાય ત્યારે આપણે ખુલાસાઓ કરીએ છીએ કે મેં તો સારા માટે કર્યું હતું. ક્યારેક ઉકળાટ ઠાલવીએ છીએ કે આવું કરવાનું? તને કંઈ બોલતાં પહેલાં જરાયે વિચાર ન આવ્યો? સારું ન બોલવું હોય તો ન બોલ પણ મન ફાવે એવું તો ન બોલ.
દરેક વખતે કોઈના ઇરાદાઓ પણ ચકાસવા ન જોઈએ. કોઈની દાનત પ્રત્યે પણ શંકા ન કરવી જોઈએ. જો એ કોઈ બદઇરાદાથી કે ખરાબ દાનતથી કંઈ કરતાં હશે તો એ છતાં થયા વગર રહેશે જ નહીં. જે જવાબ આપવો હોય એ ત્યારે ક્યાં નથી અપાતો? આપણને શંકા કરવાની એટલી બધી આદત પડી ગઈ છે કે આપણે એ સ્વીકારી જ નથી શકતાં કે કોઈ કારણ વગર કોઈ કંઈક સારું કરે! હવે બીજો સવાલ, તમે કોઈના માટે કોઈ કારણ વગર કંઈ કરો છો?કોઈને જોઈને તમને એવું થયું હોય કે આના માટે હું મારાથી બને એ બધું જ કરીશ. કોઈના પ્રત્યે આપણને લાગણી હોય છે, કોઈ આપણને ગમતું હોય છે, કોઈ આપણને સારું લાગતું હોય છે એટલે આપણે એના માટે આપણાથી થાય એ બધું કરતાં હોઈએ છીએ. પડોશીનો નાનો દીકરો કે દીકરી મોડી રાતે આઇસક્રીમ ખાવાની વાત કરે ત્યારે ઘણી વખત આપણે થાકી ગયા હોઈએ તો પણ એના માટે આઇસક્રીમ લેવા જઈએ છીએ. કયો સ્વાર્થ હોય છે એમાં? આઇસક્રીમ એને હાથમાં આપતી વખતે એના ચહેરા પર જે ખુશી દેખાય છે અને આપણને એની ખુશી જોઈને જે આનંદની અનુભૂતિ થાય છે એ અલૌકિક હોય છે. મોટા થઈ ગયા પછી પણ કોઈને એવું હોય છે કે એ ખુશ રહે. એના ચહેરા પર આનંદ જોઈને એવી જ અનુભૂતિ થતી હોય છે.
ક્યારેક એવું બને કે સારા કામનો બદલો ખરાબ શબ્દોથી મળે. મેં એના માટે આટલું કર્યું અને એણે સારા પ્રસંગે મને બોલાવ્યો પણ નહીં, યાદ પણ ન કર્યો. દુ:ખ થાય એ બહુ જ સ્વાભાવિક છે. જેના માટે આપણે કંઈક કર્યું હોય એને ક્યારેક મોડું સમજાય અને ક્યારેક આખી જિંદગી ન પણ સમજાય. જે કર્યું હોય એનો અફસોસ ન કરવો. સારું કરવાથી સારું થાય છે, જોકે એ જરૂરી નથી કે જેનું સારું કર્યું હોય એની પાસેથી જ એ થાય! બાય ધ વે, તમારા માટે કોઈએ કંઈ કર્યું હોય એ તમને યાદ છે? એનું વળતર ન વાળો તો કંઈ નહીં, એટલિસ્ટ એનો આભાર તો જરૂર માનજો. માણસને માણસ જાત પ્રત્યે વિશ્વાસ રહે એવું કરવાની જવાબદારી પણ આખરે માણસની જ હોય છે!
છેલ્લો સીન :
તમને ક્યારેય એવો વિચાર આવ્યો છે કે, દુનિયાના બધા જ લોકો સ્વાર્થી અને મતલબી છે? તો તમારી જાતને જ એવો સવાલ પૂછજો કે હું કેવો છું? -કેયુ
(‘દિવ્ય ભાસ્કર’, ‘કળશ’ પૂર્તિ, તા. 02 મે 2018, બુધવાર, ‘ચિંતનની પળે’ કોલમ)
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